समुद्रतल से करीब 11 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित दयारा बुग्याल सोमवार को पारंपरिक अंढूड़ी उत्सव यानी बटर फेस्टिवल के रंग में रंगा नजर आया। सेमेश्वर देवता की डोली की मौजूदगी में ग्रामीणों ने दूध, दही और मक्खन से अनोखी होली खेली। रासो-तांदी नृत्य और लोकगीतों ने उत्सव के माहौल को और जीवंत कर दिया।
पंचगाई पट्टी के रैथल समेत नटीण, बंद्राणी, क्यार्क और भटवाड़ी गांवों के ग्रामीण अपने आराध्य सेमेश्वर देवता की डोली के साथ दयारा बुग्याल पहुंचे। दयारा पर्यटन विकास समिति की ओर से आयोजित इस उत्सव में जिले के विभिन्न क्षेत्रों से बड़ी संख्या में ग्रामीण और श्रद्धालु भी पहुंचे।
पांच पांडवों के पगवा उतरने से शुरू हुई परंपरा
लोक मान्यता के अनुसार अंढूड़ी पर्व की शुरुआत पांच पांडवों के पगवा के अवतरित होने से हुई। इसके बाद सेमेश्वर देवता की डोली के साथ उनके पगवा भी दयारा बुग्याल पहुंचे। मान्यता है कि सेमेश्वर देवता ने कफुआ पर डांगरियों के बीच चक्कर लगाकर मेलार्थियों को आशीर्वाद दिया।
इसके बाद बुग्याल में बनी छानियों में ग्रामीणों की ओर से एकत्र दूध, दही और मक्खन को वन देवताओं और स्थानीय देवी-देवताओं को भोग लगाया गया। धार्मिक अनुष्ठान के बाद राधा-कृष्ण की जोड़ी ने मक्खन से भरी हांडी फोड़ी।
हांडी फूटते ही शुरू हुई मक्खन की होली
हांडी फूटते ही ग्रामीणों ने एक-दूसरे पर दूध, दही और मक्खन लगाकर अनोखी होली खेली। महिलाओं ने पारंपरिक लोक वेशभूषा में राधा-कृष्ण की जोड़ी के साथ रासो-तांदी नृत्य किया, वहीं पुरुषों ने भी नृत्य में बढ़-चढ़कर भाग लिया।
ढोल-दमाऊं और लोकगीतों की थाप पर देर तक ग्रामीण झूमते रहे। उत्सव में पारंपरिक संस्कृति और धार्मिक आस्था का अनूठा संगम देखने को मिला।
देवडोली के साथ उमड़ा आस्था का सैलाब
सेमेश्वर देवता की डोली के साथ ग्रामीणों की आस्था का नजारा दयारा बुग्याल में देखने को मिला। बारिश और ऊंचाई के बावजूद बड़ी संख्या में लोग उत्सव में शामिल हुए। ग्रामीणों ने देवता की पूजा-अर्चना कर क्षेत्र की सुख-समृद्धि की कामना की।
उत्सव के दौरान समिति के अध्यक्ष मनोज राणा, पृथ्वीराज राणा, किशन सिंह, बचन सिंह, सुंदर सिंह, बुद्धी लाल, मोहन लाल, बलवंत राणा, राजेंद्र सिंह, सुरेश रतूड़ी और यशवंत समेत कई लोग मौजूद रहे।
बटर फेस्टिवल उत्तरकाशी की समृद्ध लोक परंपरा, आस्था और पहाड़ी संस्कृति को जीवंत बनाए रखने वाला अनूठा पर्व है।
